वीयरागयाएणं नेहाणुबंधणाणि,
तण्हाणुबंधणाणि य वोच्छिन्दइ
तण्हाणुबंधणाणि य वोच्छिन्दइ
वीतरागता से स्नेह औ तृष्णा के बन्धन कट जाते हैं
वीतरागता से स्नेह औ तृष्णा के बन्धन कट जाते हैं
ज्ञानी स्व-परकल्याण करने में समर्थ होते हैं
स्वाध्याय से ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय होता है
हाथी और कुन्थु में समान ही जीव होता है
हँसते हुए नहीं बोलना चाहिये
क्रुद्धा लुब्ध और मुग्ध हिंसा करते हैं
सबको जीवन प्रिय है, किसीके प्राणों का अतिपात नहीं चाहिये
क्रोधविजय क्षमा का जनक है
क्षमापना से प्रसन्नता के भाव उत्पन्न होते हैं
ज्ञानी और सदाचारी मृत्युपर्यन्त त्रस्त (भयाक्रान्त) नहीं होते