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स्नेह और तृष्णा

स्नेह और तृष्णा

वीयरागयाएणं नेहाणुबंधणाणि,
तण्हाणुबंधणाणि य वोच्छिन्दइ

वीतरागता से स्नेह औ तृष्णा के बन्धन कट जाते हैं

द्वेष दुर्गुण है – त्याज्य है| द्वेष का विरोधी राग है; फिर भी राग एक दुर्गुण है और वह भी द्वेष की तरह ही त्याज्य है| Continue reading “स्नेह और तृष्णा” »

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स्वपर-कल्याण में समर्थ

स्वपर कल्याण में समर्थ

अलमप्पणो होंति अलं परेसिं

ज्ञानी स्व-परकल्याण करने में समर्थ होते हैं

पत्थर की नाव स्वयं भी डूबती है और बैठनेवाले यात्रियों को भी डुबो देती है; किंतु जो नाव काष्ट की बनी होती है, वह स्वयं भी तैरती है और दूसरों को भी तिराती है| ज्ञानियों और अज्ञानियों में यही अन्तर है| अज्ञानी स्वयं तो संसार में भटकते ही हैं, साथ ही अपने आश्रितों को भी कुमार्ग बता कर भटकाते रहते हैं, किन्तु ज्ञानी न स्वयं भटकते हैं और न दूसरों को ही भटकाते हैं| Continue reading “स्वपर-कल्याण में समर्थ” »

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स्वाध्याय से लाभ

स्वाध्याय से लाभ

सज्झाएणं नाणावरणिज्जं कम्मं खवेइ

स्वाध्याय से ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय होता है

स्वाध्याय का साधारण अर्थ है – वीतरागप्रणीत शास्त्रों का अध्ययन करना| इससे उन कर्मों का क्षय होता है, जो ज्ञान पर आवरण डाले हुए हैं| ज्यों-ज्यों हम स्वाध्याय करते जायेंगे, त्यों-त्यों ज्ञानीवरणीय कर्म क्षीण होते जायेंगे और धीरे-धीरे हमें पूर्ण ज्ञान या सर्वज्ञत्व प्राप्त हो जायेगा| Continue reading “स्वाध्याय से लाभ” »

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हाथी और कुन्थु में जीवन

हाथी और कुन्थु में जीवन

हत्थिस्स य कुन्थुस्स य समे चेव जीवे

हाथी और कुन्थु में समान ही जीव होता है

जीव और अजीव – चेतन और जड़ – स्व और पर दोनों अलग-अलग तत्त्व हैं| एक दूसरे का ये आश्रय लेते हैं, परन्तु एक दूसरे के रूप में परिवर्त्तित नहीं होते| जो जीव है वह जीव ही रहेगा व जो अजीव है, वह अजीव ही रहेगा| Continue reading “हाथी और कुन्थु में जीवन” »

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हँसते हुए न बोलें

हँसते हुए न बोलें

न हासमाणो वि गिरं वएज्जा

हँसते हुए नहीं बोलना चाहिये

हँसते हुए बोलना अथवा बोलते हुए हँसना एक दुर्गुण है – कुटेव है – मूर्खता के अनेक लक्षणों में से एक लक्षण है| Continue reading “हँसते हुए न बोलें” »

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हिंसा के कारण

हिंसा के कारण

कुद्धा हणंति, लुद्धा हणंति, मुद्धा हणंति

क्रुद्धा लुब्ध और मुग्ध हिंसा करते हैं

प्रमादवश प्राणियों के प्राणों को चोट पहुँचाना हिंसा है| हिंसा से सदा दूसरों को दुःख होता है| मनुष्य क्यों दूसरों को दुःख देता है? क्यों हिंसा करता है? इस पर विचार करके ज्ञानियों ने तीन कारण बतलाये हैं| Continue reading “हिंसा के कारण” »

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हिंसा न करें

हिंसा न करें

सव्वेसिं जीवियं पियं,
नाइवाएज्ज कंचणं

सबको जीवन प्रिय है, किसीके प्राणों का अतिपात नहीं चाहिये

कौन प्राणी है, जो जीवित रहना नहीं चाहता? अपना-अपना जीवन सभीको प्यारा लगता है| मनुष्य का जीवन कितना मूल्यवान् है – इसका पता तब लगता है, जब उसके सामने एक ओर करोड़ों स्वर्णमुद्राओं के साथ उसकी मृत्यु तथा दूसरी ओर साधारण अबल के साथ उसका जीवन रखकर इनमें से किसी एक का चयन करने के लिए उसे कहा जाये| Continue reading “हिंसा न करें” »

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क्षमा का जन्म

क्षमा का जन्म

कोहविजएणं खंतिं जणयइ

क्रोधविजय क्षमा का जनक है

अपराधी चाहता है कि यदि उसे क्षमा कर दिया जाये तो कितना अच्छा रहे| यदि पापी अपने पापों के लिए लज्जित हो रहा हो – अपने किये हुए अपराधों के लिए उसके हृदय में वास्तविक पश्‍चात्ताप हो रहा हो; तो उसे अवश्य क्षमा कर देना चाहिये| Continue reading “क्षमा का जन्म” »

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क्षमापना से लाभ

क्षमापना से लाभ

खमावणयाएणं पल्हायणभावं जणयइ

क्षमापना से प्रसन्नता के भाव उत्पन्न होते हैं

यदि किसीने हमारा अपराध कर दिया हो और हम उसके बदले उसे दण्ड देने में समर्थ हों, फिर भी दण्ड न दे कर उसे छोड़ दें – क्षमा कर दें तो इससे दोनों को प्रसन्नता होगी – अपराधी को भी और अपराध्य को भी| Continue reading “क्षमापना से लाभ” »

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ज्ञान और सदाचार

ज्ञान और सदाचार

न संतसंति मरणंते,
सीलवंता बहुस्सुया

ज्ञानी और सदाचारी मृत्युपर्यन्त त्रस्त (भयाक्रान्त) नहीं होते

दुःख भूल का परिणाम है | भूल क्यों होती है? अज्ञान से| कैसे होती है? दुराचार से| Continue reading “ज्ञान और सदाचार” »

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