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एक ही गाथा से

एक ही गाथा से

सित्थेण दोणपागं, कविं च एक्काए गाहाए

एक कण से द्रोण-भर पाक की और एक गाथा से कवि की परीक्षा हो जाती है

वस्तु की परीक्षा उसके एक अंश को देखकर भी की जा सकती है| एक चावल को दबा कर यह जाना जा सकता है कि हँडिया भर चावल पके हैं या नहीं| इस जॉंच के लिए सब चावलों को दबाना आवश्यक नहीं है| Continue reading “एक ही गाथा से” »

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आत्मविजय

आत्मविजय

सव्वं अप्पे जिए जियं

अपने को जीतने पर सबको जीत लिया जाता है

अपने को जीतने का अर्थ है – मन को जीतना – मनोवृत्तियों को अपने वश में रखना| Continue reading “आत्मविजय” »

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कृत – अकृत

कृत   अकृत

कडं कडेत्ति भासेज्जा, अकडं नो कडेत्ति य

किये हुए को कृत और न किये हुए को अकृत कहना चाहिये

इस सूक्ति में यथार्थ वचन का स्वरूप समझाया गया है| गुरु के सन्मुख विनयभाव का सूचन करते हुए आपने जो काम किया हुआ है, वह ‘कृत’ है और जो काम नहीं किया हुआ है, वह अकृत है| जो कृत है उसे कृत कहा जाये और जो अकृत है, उसे अकृत| Continue reading “कृत – अकृत” »

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कीचड़ में न फँसें

कीचड़ में न फँसें

महयं पलिगोव जाणिया, जा वि य वंदणपूयणा इहं

संसार में जो वन्दन पूजन (सन्मान) है, साधक उसे महान दलदल समझे

प्रशंसा पाने का भी एक नशा होता है| नशे में जैसे आदमी औचित्य का विचार किये बिना मनमाना काम करता रहता है; वैसे ही प्रशंसा का भूखा व्यक्ति भी औचित्य की मर्यादा भूलकर जिस कार्य से अधिक प्रशंसा मिले, वही कार्य करने लगता है| Continue reading “कीचड़ में न फँसें” »

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असंविभागी

असंविभागी

असंविभागी न हु तस्स मोक्खो

जो संविभागी नहीं है अर्थात् प्राप्त सामग्री को साथियों में बॉंटता नहीं है, उसकी मुक्ति नहीं होती

जो अकेला ही प्राप्त सामग्री का भोग करता है, उसे बहुत कम सुख मिलता है| इसके विपरीत जो व्यक्ति दूसरे साथियों को बॉंट-बॉंट कर सबके साथ बैठ कर अपनी प्राप्त सामग्री भोगता है, उसे अधिक सुख का अनुभव होता है| Continue reading “असंविभागी” »

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खाने-पीने की मात्रा

खाने पीने की मात्रा

माइ असणपाणस्स

खाने-पीने की मात्रा के ज्ञाता बनो

जो मनुष्य स्वाद का गुलाम बन जाता है, उसे भोजन की मात्रा का ज्ञान नहीं रहता| वह अपने पेट पर दया नहीं करता और ठूँस-ठूँस कर खाता है| प्रकृति ऐसे व्यक्ति को बिल्कुल क्षमा नहीं करती| उसमें अजीर्ण पैदा कर देती है, जो समस्त बीमारियों का बीज है| Continue reading “खाने-पीने की मात्रा” »

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विनय का नाशक

विनय का नाशक

माणो विणयणासणो

मान विनय का नाशक है

यहॉं मान का अर्थ-अभिमान है, सन्मान नहीं| जिस प्रकार क्रोध और प्रेम एक-साथ नहीं रह सकते; उसी प्रकार अभिमान और विनय भी एक साथ नहीं रह सकते| Continue reading “विनय का नाशक” »

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अवक्तव्य

अवक्तव्य

जं छं तं न वत्तव्वं

जो गोपनीय हो उसे न कहें

जो गोपनीय बात हो, उसे गुप्त ही रखनी चाहिये| समय या योग्य अवसर आने पर ही उसका प्रकाशन उपयुक्त होता है| Continue reading “अवक्तव्य” »

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अभोगी नहीं भटकता

अभोगी नहीं भटकता

भोगी भमइ संसारे, अभोगी विप्पमुच्चइ|

भोगी संसार में भटकता है और अभोगी मुक्त हो जाता है

जो इन्द्रियों के वश में रहता है, वह विषयसामग्री को एकत्र करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहता है| अनुकूल विषयसामग्री को जुटा कर कभी वह एक इंद्रिय को तृप्त करता है तो कभी दूसरी को| Continue reading “अभोगी नहीं भटकता” »

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अमनोज्ञ शब्द न बोलें

अमनोज्ञ शब्द न बोलें

तुमं तुमं ति अमणुं, सव्वसो तं न वत्तए

तू, तुम जैसे अमनोहर शब्द कभी नहीं बोलें

मॉं को और ईश्‍वर को ‘तू’ कहा जाता है, शेष सबको ‘आप’ कहना चाहिये| ‘आप’ शब्द सन्मान दर्शक है| दूसरों से बातचीत करते समय अथवा पत्र व्यवहार में इसी शब्द का प्रयोग करना चाहिये| यदि हम दूसरों के लिए ‘आप’ शब्द का प्रयोग करेंगे; तो दूसरे भी हमारे लिए ‘आप’ शब्द का प्रयोग करके हमें सन्मान देंगे| Continue reading “अमनोज्ञ शब्द न बोलें” »

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