खणमित्तसुक्खा बहुकालदुक्खा
विषयभोग क्षणमात्र सुख देते हैं, किंतु बहुकाल पर्यन्त दुःख देते हैं
विषयभोग क्षणमात्र सुख देते हैं, किंतु बहुकाल पर्यन्त दुःख देते हैं
चाहे भिक्षुक हो, चाहे गृहस्थ; जो सुव्रत है, वह स्वर्ग पाता है
सूक्ष्म शल्य बड़ी कठिनाई से निकाला जा सकता है
जो अभ्यन्तर को जानता है, वह बाह्य को जानता है और जो बाह्य को जानता है वह अभ्यन्तर को जानता है
सोचकर बोलें
हे राजन्! बुढ़ापा मनुष्य के सौन्दर्य को नष्ट कर देता है
अधिक प्राप्त होने पर भी संग्रह नहीं करना चाहिये
जो नये कर्मों का बन्धन नहीं करता, उसके पूर्वसञ्चित पापकर्म भी नष्ट हो जाते हैं
संयम और तप से आत्मा को भावित (पवित्र) करता हुआ साधक विहार करता है
अपने पर नियन्त्रण रखनेवाला ही इस लोक तथा परलोक में सुखी होता है