1 0 Archive | जैन स्तोत्र RSS feed for this section
post icon

आन्तरिक शुद्धि

आन्तरिक शुद्धि

उदगस्स फासेण सिया य सिद्धी,
सिज्झंसु पाणा बहवे दगंसि

यदि जलस्पर्श (स्नान) से ही सिद्धि प्राप्त होती तो बहुत-से जलजीव सिद्ध हो जाते

बहुत-से लोग स्नान करके समझते हैं कि उन्होंने बहुत बड़ी आत्मसाधना कर ली है, परन्तु ऐसे लोग अन्धविश्‍वास के शिकार हैं| वे नहीं समझते कि शारीरिक शुद्धि और आत्मिकशुद्धि में बहुत बड़ा अन्तर है| Continue reading “आन्तरिक शुद्धि” »

Leave a Comment
post icon

खून का दाग खून से नहीं धुलता

खून का दाग खून से नहीं धुलता

रुहिरकयस्स वत्थस्स रुहिरेणं चेव
पक्खालिज्जमाणस्स णत्थि सोही

रक्त-सना वस्त्र रक्त से ही धोया जाये तो वह शुद्ध नहीं होता

आग को आग से नहीं बुझाया जा सकता| कुत्ता यदि हमें काट खाये; तो इसका उपचार यह नहीं हो सकता कि हम भी कुत्ते को काट खायें| इसी प्रकार गाली का बदला गाली से या मारपीट का बदला मारपीट से नहीं चुकाया जा सकता| Continue reading “खून का दाग खून से नहीं धुलता” »

Leave a Comment
post icon

उत्तम शरण

उत्तम शरण

धम्मो दीवो पइट्ठा य, गई सरणमुत्तमं

धर्म द्वीप है, प्रतिष्ठा है, गति है और उत्तम शरण है

समुद्र में तैरते हुए जो व्यक्ति थक कर चूर हो जाता है, उसे द्वीप मिल जाये तो कितना सुख मिलेगा उससे ? धर्म भी संसार रूप सागर में तैरते हुए जीवों के लिए द्वीप के समान सुखदायक है| Continue reading “उत्तम शरण” »

Leave a Comment
post icon

जीव और शरीर

जीव और शरीर

ओ जीवो अं सरीरं

जीव अन्य है, शरीर अन्य

‘‘मैं’’ शब्द से आत्मा या जीव का प्रत्यभिज्ञान होता है; इसलिए कुछ लोग ‘‘मै अन्धा हूँ’’ आदि प्रयोग देखकर इन्द्रियों को ही आत्मा मान बैठते हैं| कुछ लोग ‘‘मैं दोड़ता हूँ’’, ‘‘मैं बीमार हूँ’’, ‘‘मैं कपड़े धोता हूँ’’, ‘‘मैं स्नान करता हूँ’’, आदि प्रयोगों के आधार पर शरीर को ही आत्मा मान लेते हैं| Continue reading “जीव और शरीर” »

Leave a Comment
post icon

उच्च नीच गोत्र

उच्च नीच गोत्र

से असइं उच्चागोए, असइं नीआगोए,
नो हीणे नो इहरित्ते

यह जीव अनेक बार उच्च गोत्रमें और अनेक बार नीच गोत्र में जन्म ले चुका है; परन्तु इससे न कोई हीन होता है, न महान|

उच्च गोत्र में पैदा होने से व्यक्ति अपने को महान समझ बैठता है और नीच गोत्र में पैदा होने से अपने को हीन या तुच्छ समझने लगता है; परन्तु ये दोनों ही बातें भ्रमपूर्ण हैं, क्यों कि व्यक्ति अनेक बार उच्च नीच गोत्रों में जन्म ले चुका है| Continue reading “उच्च नीच गोत्र” »

Leave a Comment
post icon

कामों की कामना

कामों की कामना

कामी कामे न कामए, लद्धे वा वि अलद्ध कण्हुइ

साधक कामी बनकर कामभोगों की कामना न करे| उपलब्ध को भी अनुपलब्ध समझे| प्राप्त भोगों पर भी उपेक्षा करे|

काम-भोगों का त्याग कर के जो प्रवृजित हो जाते हैं – दीक्षित हो जाते हैं, उन्हें फिर से कामुक बनकर कामभोगों की कामना कभी नहीं करनी चाहिये और न उनकी प्राप्ति के लिए कोई प्रयत्न ही करना चाहिये| Continue reading “कामों की कामना” »

Leave a Comment
post icon

कर्त्ता – भोक्ता

कर्त्ता   भोक्ता

अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण या सुहाण च

आत्मा ही सुख दुःख का कर्त्ता और भोक्ता है

सुख और दुःख अपने ही कार्यों एवं विचारों के फल हैं; दूसरों के नहीं|

हम अच्छे कार्य करते हैं; तो अपने लिए सुख का निर्माण करते हैं और यदि बुरे कार्य करते हैं; तो दुःख का निर्माण करते हैं| इस प्रकार हम स्वयं ही सुख-दुःख के निर्माता हैं, बनाने वाले हैं| Continue reading “कर्त्ता – भोक्ता” »

Leave a Comment
post icon

क्रुद्ध न हों

क्रुद्ध न हों

अणुसासिओ न कुप्पिज्जा

अनुशासन से क्रुद्ध नहीं होना चाहिये

माता-पिता एवं गुरुजन हमसे बड़े होते हैं – अधिक अनुभवी होते हैं| वे हमें सुधारने के लिए – कुमार्ग से हटा कर हमें सुमार्ग पर ले जाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं| इस प्रयत्न के सिलसिले में अनेक बार वे हमारी आलोचना करते हैं- अनेक बार हमारे दोष बताते हैं और उनसे बचने का उपदेश देते हैं| बार-बार एक ही अपराध करने पर वे हमें डॉंट-फटकार भी बताते हैं अर्थात् ताड़ना-तर्जना भी करते हैं| Continue reading “क्रुद्ध न हों” »

Leave a Comment
post icon

क्रोध न करें

क्रोध न करें

वुच्चमाणो न संजले

साधक को कोई यदि दुर्वचन कहे; तो भी वह उस पर क्रोध न करे

मनुष्य से जाने-अनजाने भूलें होती ही रहती हैं| अपनी भूलें स्वयं अपने को मालूम नहीं होतीं; इसीलिए “गुरुदेव” की जीवन में आवश्यकता होती है| वे दयावश हमें सुधारने के लिए हमारी भूलें बताते हैं| यदि हम उनके निर्देश के अनुसार विनयपूर्वक एक-एक भूल को सुधारते रहें; तो क्रमशः हमारा जीवन शुद्ध से शुद्धतर होता चला जाये| Continue reading “क्रोध न करें” »

Leave a Comment
post icon

कर्मों का बन्धन

कर्मों का बन्धन

जं जारिसं पुव्वमकासि कम्मं,
तमेव आगच्छति संपराए

पहले जो जैसा कर्म किया गया है, भविष्य में वह उसी रूप में उपस्थित होता है

लकड़ी के गेंद को यदि पानी में डाल दिया जाये तो वह डूबेगी नहीं, तैरेगी| आत्मा उससे अधिक हल्की है – बहुत हल्की; फिर भी वह संसार में डूबी हुई है| ऐसा क्यों ? Continue reading “कर्मों का बन्धन” »

Leave a Comment
Page 3 of 2712345...1020...Last »