Tattva Gyan » जैन स्तोत्र http://tattvagyan.com Tattvagyan is a comprehensive online website giving an indepth knowledge on Spirituality, Philosophy, Jain Culture, Jainism, etc. Tue, 04 Mar 2014 20:18:55 +0000 hi-IN hourly 1 http://wordpress.org/?v=3.6.1 असंवृत्तों का मोह http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/sutrakritanga-sutra/attachment-unrestraints/ http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/sutrakritanga-sutra/attachment-unrestraints/#comments Tue, 04 Mar 2014 20:18:55 +0000 Tattva Gyan http://tattvagyan.com/?p=1318 असंवृत्तों का मोह
जो असंयमी हैं – इन्द्रियों को जो अपने वश में नहीं रख सकते – मन पर जिनका बिल्कुल अधिकार नहीं है; ऐसे लोग विषयों के प्रति शीघ्र आकर्षित हो जाते हैं| विषयों के प्रति उनका यह आकर्षण उनके कर्त्तव्यपालन में बाधक बनता है – उनकी उन्नति में रोड़े अटकाता है – उनके धर्माचरण में अड़चनें […]]]>
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बन्धनमुक्त करें http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/acaranga-sutra/free-bondage/ http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/acaranga-sutra/free-bondage/#comments Tue, 04 Mar 2014 07:49:57 +0000 Tattva Gyan http://tattvagyan.com/jain-stotra/acaranga-sutra/free-bondage/ बन्धनमुक्त करें
तलवार से मनुष्य अपने हाथ-पॉंव भी काट सकता है और दूसरों के बन्धन भी – हाथों से वह दूसरों को तमाचे भी मार सकता है और उनकी सहायता भी कर सकता है| इसी प्रकार उसमें जो शक्ति है, उसका वह सदुपयोग भी कर सकता है और दुरुपयोग भी | शक्ति भी तलवार की तरह एक […]]]>
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जीवन की क्षणभुंगरता http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/acaranga-sutra/uncertainity-life/ http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/acaranga-sutra/uncertainity-life/#comments Mon, 03 Mar 2014 19:22:57 +0000 Tattva Gyan http://tattvagyan.com/jain-stotra/acaranga-sutra/uncertainity-life/ जीवन की क्षणभुंगरता
ज्यों-ज्यों समय बीतता जाता है, त्यों-त्यों हमारी आयु भी क्रमशः व्यतीत होती जाती है| जब से हमने जन्म लिया है – आँखें खोली हैं, दुनिया देखी है; तभी से हमारी अवस्था एक – एक क्षण घटती जा रही है| लोग समझते हैं कि हम बड़े हो रहे हैं; परन्तु वास्तविकता यह है कि वे छोटे […]]]>
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कर्मों से कष्ट http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/sutrakritanga-sutra/pain-karma/ http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/sutrakritanga-sutra/pain-karma/#comments Mon, 03 Mar 2014 07:11:00 +0000 Tattva Gyan http://tattvagyan.com/?p=1343 कर्मों से कष्ट
दुनिया में विषमता है| कोई जन्म ले रहा है, कोई जन्म दे रहा है – कोई जी रहा है, कोई मर रहा है – कोई धन पा रहा है, कोई खो रहा है – कोई जाग रहा है, कोई सो रहा है – कोई हँस रहा है, कोई रो रहा है – कोई सुखी है, […]]]>
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कामासक्ति को छोड़िये http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/uttaradhyayana-sutra/relinquish-sensuality/ http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/uttaradhyayana-sutra/relinquish-sensuality/#comments Sun, 02 Mar 2014 19:04:06 +0000 Tattva Gyan http://tattvagyan.com/?p=1346 कामासक्ति को छोड़िये
दुःख का जन्म कहॉं होता है ? कामना के क्षेत्र में; इच्छा की भूमि पर| जहॉं कामनाएँ हैं, विविध विषयों को प्राप्त करने की लालसाएँ हैं; वहॉं शान्ति का अस्तित्व कैसे रह सकता है ? कामासक्ति मनुष्य की मानसिक शान्ति का अपहरण करने में बड़ी ही कुशल होती है| वह व्यक्ति को विषयोंकी सामग्री एकत्र […]]]>
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बुद्धिवाद http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/uttaradhyayana-sutra/wisdom/ http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/uttaradhyayana-sutra/wisdom/#comments Sun, 02 Mar 2014 06:42:46 +0000 Tattva Gyan http://tattvagyan.com/jain-stotra/uttaradhyayana-sutra/wisdom/ बुद्धिवाद
महावीर ही थे, जिन्होंने ढाई-हजार वर्ष पहले इस सूक्ति के द्वारा बुद्धिप्रामाण्यवादका डिण्डिम घोष किया था| धर्म का निर्णय प्राचीन ग्रन्थों से या परम्परागत मान्यताओं से नहीं हो सकता| बुद्धि से और केवल बुद्धि से ही हो सकता है| स्वार्थी लोग केवल अपना उल्लू सीधा करने के लिए शास्त्रीय वाक्यों का भी दुरुपयोग किया करते […]]]>
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दुरुक्त कैसा होता है ? http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/dasavaikalika-sutra/wicked-evil-word/ http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/dasavaikalika-sutra/wicked-evil-word/#comments Sat, 01 Mar 2014 18:12:16 +0000 Tattva Gyan http://tattvagyan.com/jain-stotra/dasavaikalika-sutra/wicked-evil-word/ दुरुक्त कैसा होता है ?
सूक्त का विलोम शब्द दुरुक्त है| सूक्त अच्छा वचन है – जीवनशुद्धि का प्रेरक है तो दुरुक्त बुरा वचन है – हार्दिक क्षोभ का प्रेरक है – कलह कारक है| बुरी बात अर्थात् निन्दावचन या गाली जिस प्रकार हमें नहीं सुहाती, वैसे ही दूसरों को भी नहीं सुहाती; इसलिए हमें किसी के प्रति दुर्वचनका प्रयोग […]]]>
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गुणाकांक्षा http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/uttaradhyayana-sutra/wish-quality-growth/ http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/uttaradhyayana-sutra/wish-quality-growth/#comments Sat, 01 Mar 2014 05:42:06 +0000 Tattva Gyan http://tattvagyan.com/jain-stotra/uttaradhyayana-sutra/wish-quality-growth/ गुणाकांक्षा
जब तक शरीर नष्ट नहीं हो जाता अर्थात् मृत्यु नहीं हो जाती, तब तक हमें निरन्तर गुणों की कामना करते रहना चाहिये| विषयों की तो सभी प्राणी कामना करते रहते हैं; किंतु विवेकी व्यक्ति गुणों की कामना करते हैं| वे सभी सम्पर्क में आनेवाले व्यक्तियों से कुछ-न-कुछ सीखते रहते हैं| अच्छे गुणों का संग्रह करते […]]]>
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न बद्ध, न मुक्त http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/acaranga-sutra/neither-bonded-nor-free/ http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/acaranga-sutra/neither-bonded-nor-free/#comments Fri, 28 Feb 2014 17:40:49 +0000 Tattva Gyan http://tattvagyan.com/jain-stotra/acaranga-sutra/bonded-free/ न बद्ध, न मुक्त
कुशल पुरुष का वर्णन यहॉं आलंकारिक भाषा में किया गया है| जो बद्ध है, वह मुक्त नहीं हो सकता और जो मुक्त है, वह बद्ध नहीं हो सकता | व्यक्ति या तो बद्ध होगा या फिर मुक्त| वह दोनों एक साथ नहीं हो सकता| इसी प्रकार जो व्यक्ति बद्ध नहीं है, वह मुक्त अवश्य होगा […]]]>
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न तृप्ति, न तृष्टि http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/prasnavyakarana/neither-satisfaction-nor-contentment/ http://tattvagyan.com/hi/jain-stotra/prasnavyakarana/neither-satisfaction-nor-contentment/#comments Fri, 28 Feb 2014 05:07:09 +0000 Tattva Gyan http://tattvagyan.com/jain-stotra/prasnavyakarana/satisfaction-contentment/ न तृप्ति, न तृष्टि
पॉंच इन्द्रियॉं हैं और उनके अलग-अलग विषय हैं| जीवनभर जीव विषय-सामग्री को जुटाने के लिए दौड़-धूप करता रहता है| एक इन्द्रिय के विषय जुटाने पर दूसरी इन्द्रिय के और दूसरी के बाद तीसरी, चौथी और पॉंचवी इन्द्रिय के विषय क्रमशः जुटाने पड़ते हैं| तब तक पहली इन्द्रिय फिर से अपने विषय की मॉंग करने लगती […]]]>
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