जो अनन्यदर्शी होता है, वह अनन्याराम होता है और जो अनन्याराम होता है, वह अनन्यदर्शी होता है
अनन्यदर्शी बनें
अति मात्रा में नहीं लेते
जो अति मात्रा में अ-जल ग्रहण नहीं करता, वही निर्ग्रन्थ है
सो क्या जाने पीर पराई ?
जे बहिया जाणइ, से अज्झत्थं जाणइ|
जो अभ्यन्तर को जानता है, वह बाह्य को जानता है और जो बाह्य को जानता है वह अभ्यन्तर को जानता है
संग्रह न करे !
अधिक प्राप्त होने पर भी संग्रह नहीं करना चाहिये
हिंसा न करें
नाइवाएज्ज कंचणं
सबको जीवन प्रिय है, किसीके प्राणों का अतिपात नहीं चाहिये
वीर्यको न छिपायें
वीर्य को छिपाना नहीं चाहिये
जो बुद्धिमान हैं, उन्हें अपनी बुद्धि का उपयोग दूसरों के झगड़े मिटाने में करना चाहिये| Continue reading “वीर्यको न छिपायें” »
वृद्धावस्था
ण रतीए, ण विभूसाए
वृद्ध होने पर व्यक्ति न हास-परिहास के योग्य रहता है, न क्रीड़ा के, न रति के और न शृंगार के ही
शस्त्र या अशस्त्र ?
नत्थि असत्थं परेण परं||
शस्त्र एक से एक बढ़कर हैं, परन्तु अशस्त्र (अहिंसा) एक से एक बढ़कर नहीं है
शंकाशील न बनें
नो लहइ समाहिं
शंकाशील व्यक्ति को कभी समाधि नहीं मिलती
श्रद्धा से टिके रहें
तमेव अणुपालेज्जा विजहित्ता विसोत्तियं
जिस श्रद्धा के साथ निष्क्रमण किया है, उसी श्रद्धा के साथ विस्त्रोतसिका (शंका) छोड़कर उसका अनुपालन करना चाहिये


















